ईश्वर से प्रार्थना कैसे करें?
ईश्वर से प्रार्थना कैसे करें?
असतो मा सद् गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतं गमयेति ।।
हे परमगुरु परमात्मा! आप हम को असत् मार्ग से पृथक कर सन्मार्ग में प्राप्त कीजिये। अविद्या और अंधकार को छुड़ा के विद्यारूप सूर्य को प्राप्त कीजिये और मृत्यु रोग से पृथक करके मोक्ष के आनंदरूप अमृत को प्राप्त कीजिये। अर्थात जिस-जिस दोष व दुर्गुण से परमेश्वर और अपने को भी पृथक मान के परमेश्वर की प्रार्थना की जाती है वह विधि निषेधमुख होने से सगुण, निर्गुण प्रार्थना। जो मनुष्य जिस बात की प्रार्थना करता है उस को वैसा ही वर्तमान करना चाहिये अर्थात जैसे सर्वोत्तम बुद्धि की प्राप्ति के लिये परमेश्वर की प्रार्थना करे उस के लिये जितना अपने से प्रयत्न हो सके उतना किया करे। अर्थात अपने पुरुषार्थ के उपरान्त प्रार्थना करनी योग्य है।
ऐसी प्रार्थना कभी नहीं करनी चाहिये और न परमेश्वर उसे स्वीकार करते हैं कि जैसे हे परमेश्वर! आप मेरे शत्रुओं का नाश, मुझ को सबसे बड़ा, मेरी ही प्रतिष्ठा और मेरे ही आधीन सब हो जायें इत्यादि, क्योकि जब दोनों शत्रु एक दूसरे के नाश के लिये प्रार्थना करें तो क्या परमेश्वर दोनों का नाश कर दे? जो कोई कहे कि जिस का प्रेम अधिक उस की प्रार्थना सफल हो जावे। तब हम कह सकते हैं कि जिस का प्रेम न्यून हो उसके शत्रु का भी न्यून नाश होना चाहिये। ऐसी मूर्खता की प्रार्थना करते-करते कोई ऐसा भी प्रार्थना करेगा- हे परमेश्वर ! आप हम को रोटी बना कर खिलाइये, मकान में झाड़ लगाइये,वस्त्र धो दीजिये और खेती बाड़ी भी कीजिये। इस प्रकार जो परमेश्वर के भरोसे आलसी होकर बैठे रहते हैं वे महामूर्ख है क्योंकि जो परमेश्वर की पुरुषार्थ करने की आज्ञा है उसको जो कोई तोड़ेगा वह सुख कभी न पावेगा
परमेश्वर आज्ञा देता है कि मनुष्य सौ वर्ष पर्यन्त अर्थात जब तक जीवे तब तक कर्म करता हुआ जीने की इच्छा करे, आलसी कभी न होवे।


टिप्पणियाँ