तप क्या है? — सनातन धर्म में तप का वास्तविक स्वरूप।
तप क्या है? — सनातन धर्म में तप का वास्तविक स्वरूप (भाग–1 : तप का अर्थ, शास्त्रीय आधार एवं वास्तविक स्वरूप) ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥ श्री सद्गुरु भगवान के श्रीचरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। हमारे ब्लॉग का संकल्प यह लेख वेद, उपनिषद्, श्रीमद्भगवद्गीता, महाभारत, श्रीमद्भागवत महापुराण, मनुस्मृति तथा सनातन परंपरा के अन्य प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन पर आधारित है। जहाँ विभिन्न आचार्यों एवं परंपराओं में मतभेद हैं, वहाँ उन्हें सम्मानपूर्वक प्रस्तुत किया गया है तथा मूल शास्त्रीय सिद्धांतों को आधार बनाया गया है। प्रस्तावना सनातन धर्म में तप का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण है। ऋषियों, मुनियों, राजर्षियों और महान भक्तों के जीवन का अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि किसी भी महान आध्यात्मिक उपलब्धि के पीछे तप का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। किन्तु आज "तपस्या" शब्द को लेकर अनेक भ्रांतियाँ प्रचलित हैं। कुछ लोग तप का अर्थ केवल कठोर उपवास, शरीर को कष्ट देना या वन में जाकर रहना समझते हैं। कुछ लोग असाधारण शारीरिक कष्टों को ही तप ...